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महाबल मिश्रा आ विजया भारती सम्मानित
दिल्ली के लोग नवनिर्वाचित सांसद महाबल मिश्रा के नागरिक अभिनन्दन के साथे विजया भारती के पूंर्वाचल रत्न से पूंर्वाचल जन जागृति मंच सम्मानित कइलस।

भोजपुरिया रतन, अभिनय सम्राटः रवि किशन
प्रख्यात सिछाविद, आ राजनीतिग्य : भोजपुरी रतन डा. प्रभुनाथ सिंहजी
भोजपुरी रतन पद्मश्री शारदा सिन्हा
संगीत के प्रति समर्पित एगो साधिका आ भोजपुरी रतन विजया भारती

 

 
प्रगतिशील संवेदना के संवाहक थे `` गीतकार ‘शैलेन्द्र ´´


 

फिल्मी दुनिया के प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र का जन्म 30 अगस्त 1923 रावल पिंडी पाकिस्तान में एक परिवार में हुआ। आपका पूरा नाम शंकरदास केसरी लाल शैलेन्द्र था, जो फिल्मी दुनिया में ``शैलेन्द्र´´ के नाम से लोकप्रिय हुए। आपके पिता श्री केसरी लाल मूलत: बिहार राज्य से संबंध रखते थे। आप अपने चारों भाईयों में सबसे बड़े बेटे थे। बचपन में ही आप परिवार सहित मथुरा, उ0प्र0 में आ गए। आगरा से आपने इंलैक्ट्रीकल में डिप्लोमा किया। इसी दौरान आपकी मुलाकात सुश्री शकुन से हुई और उनसे प्यार हो गया। बाद में उन्हीं से शादी कर ली।

परिवार में बड़े होने के नाते आपने विशम परिस्थितियों को झेला। जब आपकी मां श्रीमती पार्वती देवी बहुत बीमार थी, तो आप नंगे पैर और तपती धूप में उनके स्वास्थ्य के लिए देवी-देवताओं और मंदिरों में भटकते रहे। लेकिन अंतत: उनका देहांत हो गया। इससे उन्हें गहरा सदमा लगा। अंधविश्वास और पाखंडवाद से निकलकर आप नास्तिक बन गए। आप रेलवे सेवारत थे। आपका स्थानांतरण वशZ 1947 में मुम्बई में हो गया। उस दौरान आजादी की लड़ाई चरमसीमा पर थी। आपको रेलवे की नौकरी सूट नहीं कर रही थी, लेकिन नौकरी के अलावा कमाई को कोई साधन भी तो नहीं था। आपके अंदर एक साहित्यकार छुपा हुआ था, जो बार-बार आपको साहित्य के क्षेत्र में जाने के लिए प्रेरित कर रहा था। आप रेलवे वर्कशॉप में कठोर परिश्रम करने के साथ-साथ कविताएं और गाने लिखने लिखकर अपने अंदर के साहित्यकार को बाहर निकालने का प्रयास कर रहे थे। आपकी रचनाओं को सुनकर आपके साथी आपको बार-बार इस नौकरी की बजाए लेखन के क्षेत्र में जाने के लिए प्रेरित करते।

आजादी के दीवानों के बीच आपने एक कार्यक्रम में `जलता है पंजाब´ नामक गाना सुनाया, जिसे सुनकर वहां मौजूद लोगों में जोश और कुछ कर गुजरने की तमन्ना जागृति हुई। इसी भीड़ में फिल्म अभिनेता श्री राज कपूर भी मौजूद थे। उनकी योग्यता और गीत लिखने की शैली से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने श्री शैलेन्द्र जी को अपनी फिल्मों के लिए गीत लिखने का ऑफर दे दिया। लेकिन उन्होंने उसे नहीं स्वीकार किया। वे कहते थे कि उनके गीत बिकने के लिए नहीं हैं। लेकिन जब उनके पहले बेटे शैली ने जन्म लिया तो पैसे की तंगी के चलते उन्होंने श्री राजकूपर से संपर्क किया और फिल्मों में गाने लिखने की अपनी सहमति दे दी। आपने वशZ 1948 में बनी फिल्म आग के गाने लिखे और हिट हुए। शैलेन्द्र ने पहली बार 500 रूपए में वशZ 1949 में बनी फिल्म बरसात केवल दो गाने - `पतली कमर है´ और ` बरसात में´ लिखे। इसके बाद लगातार उनके लिखे गाने हिट होते रहे। राजकपूर की फिल्मी दुनिया में बेहतर छबि बनाने में श्री ‘शैलेन्द्र का योगदान अतुलनीय था इसे श्री राजकपूर ने भी स्वीकार किया। इसके बाद अभिनेता राजकूपर, गायक मुकेश और संगीतकार शंकर जयकिशन और गीतकार शैलेन्द्र की अटूट जोड़ी ने फिल्मी दुनिया में क्रांतिकारी भूमिका निभाई।

 

प्रगतिशील संवेदना के संवाहक गीतकार शैलेन्द्र ने अपने गीतों के माध्यम से भारत की छबि को दुनिया में उभारने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई। आपनेे 171 हिन्दी फिल्मों एवं 6 भोजपुरी फिल्मों में लगभग 800 फिल्मी गीत लिखे जिनमें प्रमुख हैं `आवारा´ `दो बीघा जमींन´, `श्री 420´, `जिस देश में गंगा बहती है´, `संगम´, सीमा´, `मधुमती´, `जागते रहो´, `गाइड´, `बूट पालिस´, `यहूदी´, `अनाड़ी´,`पतिता´, `दाग´, `मेरी सूरत तेरी आंखें´, `बंदिनी´, `गुमनाम´ और `तीसरी कसम´ आदि फिल्में शामिल ताामिल हैं। उन्होंने भोजपुरी फिल्मों के लिए भी गाने लिखे। बिहार और उत्तर प्रदेश की कला-संस्कृति और यहां की लोकसंगीत की अच्छी पकड़ उनके गीतों में देखी जा सकती है। उनके लिखे ` चढ़ गयो पापी बिच्छुआ´, ` सजनवा बैरी हो गए हमार´ आदि मधुर गीतों को सुनकर मन आज भी डोल उठता है। आपने फिल्म `नया घर´, `बूट पालिस´, `श्री 420´ और `मुसाफिर´ में अभिनय भी किया था। इतना ही नहीं आपने फिल्म `परख´ के लिए संवाद भी लिखे थे।
गीतों के माध्यम से भारत की दुनिया में जिस छबि को उजागर किया, यह उनकी भारत के प्रति निश्ठा और समर्पण को ही दशाZता है। फित्म 420 में `मेरा जूता है जापानी´, ये पतलून है इंगिलिशतानी, सिर पर लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी´ जैसा गाना लिखकर अपने देश का गौरव को ही बढ़ाया। उनके एक - एक गीत में कोई न कोई संदेश अवश्य छिपाह हुआ है जो मानवता, देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत होते हैं। एक प्रकार से वे अपने युग की सशक्त आवाज थे। आज के दौर में शैलेन्द्र जी जैसे गीतकारों की कमी अखरती है। फिल्म अभिनेता राजकपूर ने स्पश्ट कहा था कि ` शैलेन्द्र के हर गीत में कुछ न कुछ विचार, दशZन और भावनात्मक तीव्रता थी।´´

आप कवि, गीतकार, एक अभिनेता, संवाद लेखक और फिल्म निर्माता भी रहे हैं। आपकी अपनी पहली हिन्दी फिल्म `तीसरी कसम´ के निर्माता एवं गीतकार वे स्वयं ही थे। वशZ 1966 में बनी यह आपकी अंतिम फिल्म साबित हुई। आपने इस फिल्म के निर्माण में अपना सबकुछ दाव पर लगा दिया था। ऊंची दर पर रूपए उधार लिए। लेकिन फिर भी समय पर यह फिल्म पूरी नहीं हो सकी, क्योंकि अभिनेता राजकपूर अपनी फिल्म संगम और अन्य फिल्मों में व्यस्त थे। अंतत: उन्होंने इस फिल्म के लिए समय निकाला। उन्हेांने इस फिल्म में काम करने के लिए मात्र एक रूपया ही लिया, क्योंकि शैलेन्द्र उनके प्रिय मित्रों में से एक थे। जब यह फिल्म बनकर तैयार हुई तो इसके प्रीमियर शो को शैलेन्द्र ने नहीं देखा। किसी ने आपको यह बताया कि यह फिल्म पूरी तरह से फ्लॉप हो गई है, तो आप इसे सहन नहीं कर सके। आपको दिल का दौरा पड़ा और 14 दिसम्बर वशZ 1966 को आपने इस दुनिया को सदा-सदा के लिए छोड़ दिया। क्या संयोग था कि उस दिन फिल्म अभिनेता राजकपूर का भी जन्म दिन था। आपके देहांत के बाद यह फिल्म सुपरहिट हुई। जिसे बाद में राश्ट्रपति के स्वर्णपदक से भी सम्मानित किया गया। आपको वशZ 1958 में बनी फिल्म यहूदी के गीत ` ये मेरा दीवाना पन है´, फिल्म 1959 में बनी `अनारी´ के गाने ` सबकुछ सीखा हमने´ और वशZ 1968 में बनी फिल्म `ब्रह्मचारी´ के गीत ` मैं गाऊं तुम सोजा´ के लिए `फिल्म फेयर अवार्ड´ से सम्मानित किया गया है।

आपके परिवार में पत्नी श्रीमती शकुन शैलेन्द्र, बेटा शैली शैलेन्द्र उर्फ मंटू, मनोज ‘
शैलेन्द्र उर्फ बबलू हैं। आपके बेटे श्री शैली शैलेन्द्र भी एक गीतकार और गायक कलाकार थे, लेकिन आज वे इस दुनिया में नहीं हैं। शैलेन्द्र ने फिल्म मेरा नाम जोकर के लिए एक गीत की केवल दो लाइनें `जीना यहां, मरना यहां´ वे इसे पूरा नहीं कर सके और बीच में ही इस दुनिया को छोड़कर चले गए। इस गाने को उनके बेटे शैली शैलेन्द्र ने पूरा करते हुए अपने पिता के अधूरे को बखूबी पूरा किया फिल्मी दुनिया में अकेले शैलेन्द्र ही ऐसे गीतकार हुए हैं जिन्होंंने अपनी योग्यता और प्रतिभा का लोहा मनवाया।

गीतकार शैलेन्द्र ने अपने मान-सम्मान के लिए कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने गरीबी और अमीरी को काफी नजदीकी से देखा। उनके अंदर विशम परिस्थितियों में भी काम करने की गजब की क्षमता थी। एक बार की बात है कि जब उनका प्रेम विवाह के बाद पत्नी श्रीमती शकुनी शैलेन्द्र उनके घर आई तो उन्होंने देखा कि वे अपने साथ बहुत सारे कीमती कपड़े, जेवर तथा अन्य सामान लेकर आईं है, तो यह देखकर वे अपनी पत्नी से बोले ``देखो, तुम यह सब पहनकर हमारे साथ चलोगी तोे यह सब तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा। यह सब अभी छोड़ो। जब हम इस लाइक हो जाएंगे, जब हम तुम्हें कपड़े, जेवर खुदं पहनाएंगे।´´ उन्होंने ऐसा ही किया। उनकी पत्नी ने सदैव उनका साथ दिया और ऐसे भी दिन आए कि उन्होेंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया।

वे अपने बच्चों और पत्नी से बेहद प्यार करते थे। उन्होंने अपने बच्चों पर कभी हाथ नहीं उठाया। एक बार उनके बेटे मनोज शैलेन्द्र जब हाई स्कूल में थे, तो अपनी रिपोर्ट दिखाने उनके कमरे में गए। उन्होंने रिपोर्ट कार्ड देखा तो नम्बर काफी कम थे। इस पर वे अपने बेटे पर बहुत नाराज हुए। उन्होंने उन्हें मारने-पीटने की बजाए कहा कि ``यह अच्छा नहीं है, आप हमारे कमरे से बाहर जाओ, हम तुमसे बात नहीं करेंगे।´´ यह उनके बेटे मनोज के लिए बहुत ही दर्दनांक घटना थी। वे उस दिन बहुत दु:खी थे और अंदर ही अंदर रो रहे थे। उन्हें एहसास हुआ कि `वे हमें दो थप्पड़ मार देते तो मुझे इतना दर्द नहीं होता। लेकिन यह मेरी पिटाई से भी गहरी चोट थी। मैं पुन: उनके पास उनके कमरे में गया और मांफी मांगते हुए कहा कि मैं नििश्चत रूप से सुधार करूंगा।´´ ऐसी घटनाओं से उनकी दयालुता, उनका प्यार और बच्चों के प्रति लगाव झलकता है।

शैलेन्द्र जी एक दाशZनिक गीतकार थे। उनके गीतों में सहजता के साथ जीवन के सत्य को भी बखूबी देखा जा सकता है। उन्होंने अपनी बात को गीतों के माध्यम से ऐसे प्रस्तुत की ताकि आमआदमी बड़ी आसानी से समझ सके। उनके मित्र फिल्म पत्रकार श्री रामकृष्ण जी उनके जिंदगी के बारे में लिखते हैं कि `` वो उन दिनों के किस्से सुनाता ....जब पारेल मजदूर बस्ती के धुुएं और सीलन से भरी गंदी कोठरी में अपने बाल-बच्चों को लेकर वह अपने बाली-बच्चों के सपने देखा करता था और इन दिनों के किस्से जब `रिमझिम´ जैसे शानदार मकान और एस्टिन कैिम्ब्रज जैसी लम्बी गाड़ी का स्वामी होने के बावजूद अपने बीते लमहों की आग उसे शराब की प्यालियों से बुझानी पड़ती।´´ शैलेन्द्र कहते थे कि .. रामकृष्ण, सच ही भूल नहीं पाता मैं, मानसिक शांति का संबंध लगता है धन-दौलत और ऐशोराम के साथ बिल्कुल नहीं है। ऐसी बात न होती तो आज मुझे वह सकून, वह चैन क्यों नहीं मिल पाता। आखिर जो उस हालत में मुझे आसानी से नसीब था, आज जब मेरे पास वह सबकुछ है जिसकी तमन्ना कोई कर सकता है, इज्जत पैसा यह सब ...शैलेन्द्र जी कहते-कहते अचानक ही बड़ी गंभीरता के साथ चुप हो जाया करते थे और देखने लगते थे मेरी आंखों की ओर जैसे उनके सवालों का जवाब शायद वहां से उन्हें मिल सके।

प्रसिद्ध संगीतकार शंकर जयकिशन के श्री शंकर जी ने एक बार गीतकार शैलेन्द्र जी के बारे में कहा था कि `सच्ची और खरी बात कहना और सुनना शैलेन्द्र जी को अच्छा लगता था। कई बार गीत के बोलों को लेकर हम खूब झगड़ते थे, लेकिन गीत की बात जहां खत्म होती, फिर वही घी-शंकर....। शैलेन्द्र जी एक सीधे-साधे आदमी थे, झूठ से उन्हें नफरत थी क्योंकि उनका विश्वास था कि `खुदा के पास जाना है।´ इसी लिए तो उनका वह गाना `सजन रे झूठ मत बोलो-खुदा के पास जाना है´। आज भी यह गीत सुनकर लोगों के दिलो-दिमाग में हलचल पैदा होने लगती है।

आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें, उनके गाने आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर करते हैं। उन्होंने स्पश्ट लिखा है कि “ प् ंउ जीम मंतसल उवतदपही सपहीजण् प् बेंज दव ेींकवूेए प् ींअम दव ेींकवू इमीपदकण् ज्ीम ेनद पे उंल िंजीमतण्ण्ण्ण्ण्ण्घ् ऐसे महान कलाकार को उनकी अतुलनीय सेवाओं के लिए भारत रत्न जैसे पुरस्कार से सम्माननित किया जाना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि भारत सरकार ने दलित समाज में पैदा हुए साहित्यकारों, कलाकारों, लेखकों और अन्य क्षेत्रों में उनके उल्लेखनीय योगदान को ध्यान में रखते हुए जो मान-सम्मान मिलना चाहिए था वह नहीं मिल सका। दलित समाज में जिन अन्य फिल्मी हस्तियों ने अपनी पहचान बनाई उनमें गीतकार शैलेन्द्र के अलावा पूनम मेहमी ( फिल्म `लव आज कल´ में), दिव्या भारती आदि हीराइनें हुई हैं। लेकिन आज दिव्या भारती इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी एक हादसे में मौत हो गई थी।

ऐसे साहित्यकारों, कलाकारों और समाज के योग्य प्रतिभाओं के मान-सम्मान हेतु इग्नू के प्रो0 शत्रुघ्न कुमार के साथ मिलकर `शैलेन्द्र सांस्कृतिक केन्द्र´´ नामक संगठन की स्थापना की। इसके माध्यम से प्रख्यात गीतकार शैलेन्द्र जी को ``भारत रत्न´´ से विभूशित कराना। गीत, संगीत, साहित्य, पत्रकारिता, कला एवं गायन के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले दलित समाज के छह प्रतिभाओं को `गीतकार शैलेन्द्र सांस्कृतिक सम्मान´ प्रदान करना। गीतकार शैलेन्द्र जी द्वारा लिखे गए गीतों के आधार पर शोधकार्य करना। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को ध्यान में रखते फिल्म, डोक्यूमेंट्री फिल्म आदि का निर्माण करना। संपूर्ण भारत में दलित समाज के प्रतिभावान गीतकार, संगीतकार, लेखक, कहानीकार, पत्रकार, उपन्यासकार, गायक, निर्देशक आदि की खोज के लिए करते हुए `शैलेन्द्र प्रतिभा खोज (शैलेन्द्र टैलेंट हंट)´ की ‘ाुरूआत करना आदि ‘ाामिल हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रम, डॉक्यूमेन्ट्री फिल्म एवं `गीतकार शैलेन्द्र सम्मान´ देने की शुरूआत हो कर रहे हैं ताकि हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर सकें।

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संपर्क : सम्यक भवन
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श्री कामता प्रसाद मौर्य का जन्म 11 अप्रैल 1968 को गांव मुहब्बतपुर, जिला मैनपुरी (उ0प्र0) में जाटव (चमार) जाति में हुआ। आपके पिता स्वर्गीय श्री होरी लाल एक गरीब किसान थे। आपकी प्रारिम्भक शिक्षा गांव के ही प्राइमरी स्कूल में पूरी की। आपने हाई स्कूल आजाद हिन्द इंटर कॉलेज करहल, मैनपुरी उ0प्र0 और आगे की पढ़ाई दिल्ली में आकर पूरी की। दिल्ली में अपने बड़े भाई श्री बेनी राम मौर्य के साथ रह कर आपने बी.काम एवं पाली भाशा में एक वशZ का डिप्लोमा दिल्ली विश्वविद्यालय से किया। आपके बचपन का सपना डॉक्टर बनकर दलित समाज की सेवा करना था। लेकिन गरीबी और परिस्थितियों के चलते आप ऐसा नहीं कर सके। आपने अंदर बचपन से की कुछ कर गुजरने की तमन्ना थी। कविताएं, लेख लिखना और नए-नए लोगों से मिलना आपका ‘ाौक बचपन से ही रहा है। इसी के चलते आपने वशZ 1998 में `दलित हितैशी´ हिन्दी मासिक समाचार पत्र निकाला। दलित समाज के सहयोग न मिलने और इसे लोगों द्वारा छिपा कर रखने की प्रवृत्ति से आपका मन खिन्न हो गया और आपने इसके स्थान पर जनवरी 2004 से `सम्यक भारत´ साप्ताहिक पत्रिका निकाली। लगभग एक साथ तक अपने दम पर इसे निकालने के बाद आर्थिक अभाव के चलते इसे मासिक में बदल दिया। यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है। आपने अंजाम (अंतर्राश्ट्रीय जाटव महासंघ) की स्थापना की। इसके अलावा आप ``शैलेन्द्र सांस्कृति केन्द्र´´ के संस्थापकों में से एक हैं।

आपके लेख नवभारत टाइम्स, राश्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, जेवीजी टाइम्स, ‘ााह टाइम्स, जनसत्ता, दैनिक सवेरा, माधव संदेश, दिन-रात, नवभारत, बाल भारती, हम दलित, परिशद संदेश आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित हो चुके हैं। आपके लेख `छपास डॉट कॉम´ पर भी आलेख पढ़े जा सकते हैं। आपके प्रयासों के चलते प्रथम दलित हितैशी काव्यगोश्ठी रोहिणी दिल्ली में आयोजित की गई। आपने कई कवि सम्मेलनों में कविता पाठ और आलेख भी प्रस्तुत किए हैं। आपका धर्मान्तरण पर विशेश साक्षात्कार `जैन टीवी´ पर प्रसारित हुआ। इसके अलावा आपके द्वारा पटेल चेक्ट के चिकित्सा विशेशज्ञ के साथ `स्वास्थ्य के लिए हानिकारक : धूम्रपान´ विशय पर हुई भेंटवार्ता प्रसारित की गई। आपके प्रयास से दिल्ली में डॉ0अम्बेडकर समाज विकास परिशद की ओर से 7 नि:शुल्क चिकित्सा शिविर लगाए गए। आरक्षण विरोधी ज्ञापनों को समाप्त कराने के आंदोलन और दिल्ली में आयोजित अंतर्राश्ट्रीय धम्मदीक्षा में विशेश योगदान रहा है। आपके लेखन और सामाजिक कार्यों के लिए समय-समय पर आपको पुरस्कृत भी किया जा चुका है।

 

 


 



 

 


 
   
 
 
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आठ हजार करोड़ के भी बनाई भोजपुरी फिल्म
बरखा में जलवा मुन्नी बाई के
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 


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