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नया साल आवे वाला बा। सोचतानी कुछ नया कहीं।........ हम नेट पर गीत-ग़ज़ल आ कविता कहे खातिर प्रसिद्ध बानी आ इहे हमार पहचान रहल बा। बाकिर कबो-कबो कुछ अउर कहल भी मजबूरी हो जाला। हम ना चाहत रहनी ह। अपना मन के बहुत दबवनी। बहुत रोकलीं। अपना मित्र आ भाई के भी रोकलीं कि कुछ मत कहए लोग।.....हाथी चले बाजार त कुत्ता भौंके हजार।....... बाकिर अति के बाद चुप्पी ठीक ना होला। ए साल हमरा पर दु गो बड़हन आरोप मढ़ल गइल आ ओकरा के दुनिया के सबसे बड़ा जुर्म बतावत एह तरह से लगातार प्रोजेक्ट कइल गइल जइसे कि देश में अउर कवनो समस्ये ना होखे। इहे ना जेतना उलटा-पुलटा आ भला-बुरा कहल जा सकेला, कमेंट का माध्यम से कहल गइल। माने कि हमरा के खूब गरियावल गइल......आ एह काम के हंस-हंस के अंजाम देहले सुधीर कुमार। भोजपुरी का इंटरनेटी दुनिया में जे एक्टिव बा उ सभे जानता कि सुधीर कुमार कई बार खुल के कह चुकल बाड़न कि मनोज भावुक से हमरा ना जमें। माने कि उनका हमरा से दुश्मनी बा..... मतलब कि हमरा खिलाफ लिख-लिख के आ उलटा-पुलटा कमेंट छाप के ऊ पत्रकारिता नइखन करत बल्कि दुश्मनी निभावत बाड़न। दूगो खबर छपल। फिर भी चलीं अगर हम दोशी बानी त हमरा जेल हो जाई, आजीवन कारावास हो जाई या फांसी हो जाई। तब सुधीर कुमार थपरी बजइहें, नचिहें, झूमर परिहें, सोहर गइहें आ उत्सव मनइहें कि चलS भावुक मर गइलें- हमार जानी दुश्मन। दोसर आरोप मढ़ल गइल बा- ठगी के। खंडन करें खातिर हम एह खबर के सच्चाई भी सुधीर जी से बतवनी बाकिर उहंा जूं ना रेंगल। रेंगित कहंा से, इहंा त पत्रकारिता ना दुश्मनी साधल जात रहे। सुधीर बाबू, ``बिना दूसरा पक्ष के जनले या जान के भी अंजान बनल रहल अउर व्यक्तिगत दुश्मनी के वजह से केहू के उपर आरोप मढ़े, बदनाम करे आ नेट पर कमेंट के बहाने अपशब्दन के प्रयोग करे के स्वस्थ पत्रकारिता ना कहल जाला, इ मन के मलिनता ह। निश्पक्षता ना नपुंसकता ह´´ बेवसाइट के खेल हमरो मालूम बा, हमरो पास कइगो ब्लाग्स आ बेवसाइट बा। नाम बदल-बदल के या अपना चार गो चमचा द्वारा उलटा-पुलटा आ निगेटिव कमेंट डलवा के अउर मनोज भावुक के पक्ष में आवे वाला कमेंट्स के ना छाप के अगर रउरा अपना के बहुत होशियार बुझत बानी त इ राउर मूर्खता बा। आज कल के पब्लिक सब बुझतिया.............उ राउर नियत आ मानसिकता समझ चुकल बिया।............. और सुधीर जी अपना बेवसाइट पर हमहूं अइसन कमेंट्स डलवा सकत बानी कि `सुधीर कुमार जैसे बेवसाइट चलाने वाले को जिसे पता ही नहीं कि स्वस्थ पत्रकारिता क्या है, जूते मारना चाहिये.......समाज से बहिश्कृत कर देना चाहिये, ऐसे लोगों कि वजह से ही पत्रकारिता बदनाम है, सुधीर आइने में पहले अपनी सूरत देखो फिर किसी पर उंगली उठाना....... आदि आदि´ लेकिन इ सब अशोभनीय बा। एहसे हम तो कतई इ सब ना करब। रउरा सभे के मालूमे बा कि हम लंदन आ अिफ्रका में 4-5 साल रह चुकल बानी आ 28-30 लाख पर एनम पर काम कर चुकल बानी लेकिन पंकज आ सुधीर हमरा के एतना छोट अंाकल लोग कि आरोपो लगवलन त मात्र 55 हजार के। अगर एकरा मे लेश मात्र भी सच्चाई बा त इ लोग अभी ले हमरा खिलाफ मुकदमा काहे ना कइलस ? भोजपुरिया भाई लोग जानता कि गीत-संगीत से हमरा बेहद लगाव रहल बा। लंदन छोड़ के टी.वी. चैनल आदि से जुड़े के इहे कारणों रहल बा। जब आर.डी.म्यूज़िक ‘शुरू भइल त हमरा बहुत खुशी भइल। सोनभद्र में पहिला टेलेंट हंट भइल। सैकड़ों प्रतिभागी भाग लेलें। सहभागिता ‘शुल्क के रूप में प्रत्येक प्रतिभागी से 150 रूपया लिहल गइल रहे। रउरा लोग के जान के आश्चर्य होई कि प्रतियोगिता के बाद हम प्रत्येक प्रतिभागी के 150 रूपया ‘शुल्क तक लौटा देले रहीं, इ कहत कि पैसा कमाइल हमनी के उद्देश्य नइखे, अच्छा टेलेंट खोजल उद्देश्य बा। अइसन प्रयास के उत्तर प्रदेश के कई गो समाचार पत्र खूबे प्रशंसा कइलस। अखबार कटिंग हमरा पास रखल बा। पचासों हजार रूपया कार्यक्रम में लाग गइल बाकिर हम प्रतिभागी से एक पैसा ना लेनी......जबकि लाखों कमा सकत रहनी। अइसन टीम पर सुधीर कुमार आ पंकज आरोप मढ़ले बाड़न। पंकज जी से हम एगो अउर बात पूछे के चाहत बानी कि तू महुआ पर बिहाने-बिहाने कार्यक्रम में हमार लिखल गाना जौन कि भोजपुरी के विभिन्न पत्र-पत्रिकन में आज से 7-8 साल पहिले प्रकाशित हो चुकल बा, `दाया बाया आंखें में ना, अंग-अंग में फड़कS´ गवलS। का तू हमार लिखल गाना गावे खातिर हमरा से लिखित अनुमति लेले बाड़S ? का इ गैर कानूनी नइखे ? आज हमरा डा. उर्मिलेश के बहुत याद आवत बा। उनकर ‘शेर बा- बहुत बढ़िया सुधीर जी। रउरा एह साल हमरा के मुफ्त में पब्लिसिटी देनी आ हमरा के हमेशा सुर्खी में रखनी। एकरा खातिर हम राउर ‘शुक्रगुजार बानी। हम फेर कहत बानी कि इ सब बोलल कहल हमार स्वभाव ना ह। हमार स्वभाव ह गीत, गज़ल, कविता। हम एही से रउरा सब से जुड़ल बानी और भविश्य में भी........ इहां तक कि मरणोपरांत भी जुड़ल रहब।......... सुधीर कुमार त हमरा के साहित्य आ समाज से निकल जाये तक के चेतावनी दे चुकल बाड़न। जबकि उनका के आज से 4 साल पहिलहूं........... जब हम आपन किताब उनका के छापे के ना देनी आ ओह पर विवाद भइल तबो समझवले रही कि सुधीर बाबू राउर सात पुश्त मिल के भी कवनो साहित्यकार के साहित्य सृजन करे से नइखे रोक सकत।.............. हम त टूटलो पर.....मुअलो पर..........`मैं तो ‘शायर हूं, किताबों में बिखर जाऊंगा´। हम एक बार फिर अपना प्रशंसक आ ‘शुभचिंतक भाई लोग के नया साल के बहुत-बहुत बधाई देत बानी आ साथ ही एगो खुशखबरी भी......... कि रउरा भोजपुरिया ‘ाायर मनोज भावुक के अगिला किताब `जिनगी रोज सवाल´ बहुत जल्दी रउरा लोग का सोझा होई। हमार गजल संग्रह `तस्वीर जिन्दगी के´ पर लगातार रउरा लोग के जौन प्रशंसा पत्र, बधाई, प्रोत्साहन आ आर्शिवाद मिलत रहल बा, हम हृदय से ओकरा खातिर आभारी बानी। हाथी चले बाजार तS कुत्ता भौंके हजार। भावुक छोटे उम्र में एतना फइलल नंाव। कुकुराहट में मत पड़ी, ई कुकुरन के काम। प्रणाम। बहुत-बहुत प्रणाम।
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