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भला जो देखन मैं चला भला न मिलया कोय |
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इंसान होखला के नाते ईऽ कहल तऽ मुश्किल बा कि तृष्णा से बचे के जरुरत बा बल्कि एक इंसान होखला के नाते हम तऽ ईऽ कहेब कि जबले तृष्णा बा तब ले ही सृष्टि के आधार बा। हाँ आज के दौर के देखत के ईऽ जरुर कहल जा सकल जाला कि आज मृगतृष्णा से बचे के जरुरत बा बाकि हमरा शब्दकोष में मृगतृष्णा के अर्थ जरा अलगा बा। मृगतृष्णा के सांसारिक अर्थ में मृग अउरी कस्तूरी के वर्णन होला जेकरा में मृग कस्तुरी के गमक से ओकरा के पावे खातिर एहर ओहर भागत रहेला जबकि कस्तूरी तऽ ओकरा कण्ठ (कुण्डल) ही वास करे ला। हमरा मृगतृष्णा के अर्थ उऽ कस्तूरी से बा जवन आप के लगे नाही बा लेकिन आपके चाहे वाला, चाहे आप के चुरकी लेबे वाला लोग आपके बराबर एहसास करावे ला कि अरे रउआ कहाँ फसल बानी रउआ तऽ हीरा के खान बानी राउर जगह ईहाँ नाही कहीं अउर बा। ई कहीं अउरी के सन्दर्भ में कई इलाका के जोड़ल जा सकल जाला मगर फिलहाल हम एगुड़े खास इलाका के चर्चा करेब जेकरा खातिर एगो छोट कहनी कहल जरुरी बा जेकरा बाद रउआ लोगिन खूद ब खुद समझ जायेब कि हम कहाँ के जिक्र करे चाह रहल बानी।
१२ साल पुरान बात बा जब हम फिल्म लाइन में राईटिंग के काम करत रहनी। यदि बहुत ज्यादा सफल ना रहनी तऽ कवनो बात के कमी भी ना रहे आ जवन भी काम करत रहीं अपना हिसाब में ही करत रहीं। वही समय हमरा परिचितिन में एक जाना फिल्म लाईन में एक्टिंग करे खातिर आ गईऽले। अपना हिसाब से कवनो गलत भी ना आईऽल रहले काहे से ३० साल से थियटर में अभिनय ही करत रहले। अउरी उनका के ईऽ बात के गर्व भी रहे बाकि एक छोट शहर के अभिनय के दुनिया अउरी फिल्म लाईन के अभिनय के दुनिया के बीच के अन्तर के जाने के चाहे माने के तैयार ही ना भईले। प्रयास करके कुछ काम दियावल भी गईऽल लेकिन उनका तरक्की के राह में उनका शहर अउरी मुम्बई के फिल्म लाईन के बीच के अन्तर ही रोड़ा बने लागल। आखिर में ८ महिना अउरी घर के काफी पैसा गवाँ के वापिस लौट गईले अउरी आज जवन भी कर रहल बाड़े ओमे बहुते खुश बाड़े। जाहिर बा कि मुम्बई जाये खातिर उनका के कई लोग एहसास करवले होखी कि तोहरा लगे जवन कस्तुरी बा ऊऽ केहु के पास नईऽखे से मुम्बई पहूँच जा। उनका पँजरा तऽ फिर भी ३२ साल के अनुभव रहे जेकरा वजह से ऊऽ हालात से लड़े के बाद सम्भले में कामयाब हो गईले लेकिन आज ना जाने केतना लोग दुसरा के एहसास करावल कस्तुरी पावे खातिर दर दर भटक रहल बा अउरी मानसिक रुप से विच्छिप्त भी हो रहल बा अउरी अपना असफलता के दोष दुसरा पर मढ़ के दुसरा के गरिया भी रहल बा लोग जबकि हकीकत में ना तऽ ओह लोगन के पास कवनो कस्तुरी बा अउरी ना ही कस्तुरी पावे खातिर कवनो भी गुण। जवन भी बा दुसरा के बहकावल भरल बात के बल पर झूठा आत्मविश्वास जेकरा के ओह आदमी के अतिविश्चास भी ना कहल जा सकल जाला अउरी जेकरा के ऊऽ अपना अभिमान के रुप में साथे लेले एहर ओहर भटकल करेला।
अईसने लोगन के फायदा उठावे खातिर कुछ लोग आपन दुकान खोल के बईठल बा जे आपन दुकान त् बेहया बनके चलावत बा साथे साथे ओह जगत से जूड़ल अपना जईसन दुसर लेकिन सही आदमी के भी गाली खियावे में मदद कर रहल बा। बात हम फिल्म लाईन के कर रहल बानी पर ईऽ उदाहरण हर ईलाका के विषय मे निर्विवाद रुप से दिहल जा सकल जाला। से भाई लोग नम्र निवेदन बा कि दुसरा के बतावल कस्तुरी के पावे के कोशिश कईला से पहिल जरुरी बा कि अपना आप के पहिचानी जा। अपना आप के पहिचाने के बाद ईऽ जानल जरुरी बा कि जहँवा आप बानी अउरी जहँवा आप जाये चाह रहल बानी ओह जगह में अउरी आपके वर्तमान जगह के बीच में बुनियादि फर्क का बा। सब आँकलन कईऽला के बाद यदि रउआ के लागे कि रउआ कस्तुरी पावे में समर्थ बानी तऽ प्रयास जरुर करीं लेकिन फिर ओह जगत के जयचन्दन के पहिचाने के गुण से भी परिचित होखे के पड़ी ना तऽ सब कुछ रहते हुए भी निराशा हाथ लगे के सिवा कुछुओ ना होखी अउरी फिर घुन के साथे गेहुँ भी पिसाला के तर्ज पर गलत आदमी के साथे साथे सही आदमी के भी गाली देबे लागब। अंत मे कबीर दास जी के तर्ज पर आपन दू लाईन से बात खतम करेब..।
भला जो देखन मैं चला भला न मिलया कोय..,
जो जग ढ़ुँढ़ा आपना पाया खुद से बुरा न कोय।।
: - अभय कृष्ण त्रिपाठी
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